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बांकीपुर में BJP की कौन-सी गलतियां प्रशांत किशोर की जीत की वजह बनीं?

बांकीपुर उपचुनाव में PK की जीत का विश्लेषण. जानिए भरत तिवारी एनकाउंटर ने कैसे ने कैसे इस सीट का रुख बदल दिया.

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साल 2025 में बिहार की राजनीति में निराशाजनक पदार्पण के बाद डूबते उतराते प्रशांत किशोर को पटना की हाईप्रोफाइल विधानसभा सीट बांकीपुर पर हुए उपचुनाव ने एक मजबूत पतवार दे दिया, जिसकी बदौलत वह अगले चार साल तक बिहार में बने रहकर पार्टी को मजबूत कर सकते हैं.

प्रशांत किशोर ने 64,117 वोट लाकर बीजेपी नेता नीरज कुमार को 19,324 वोटों के मार्जिन से हरा दिया. जीत का अंतर हालांकि बड़ा नहीं है, लेकिन यह चुनाव परिणाम इस मायने में ऐतिहासिक है कि प्रशांत किशोर ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की उस सीट पर जीत का परचम लहराया है, जिस पर पिछले कम से कम ढाई दशकों से बीजेपी का कब्जा था. यह जीत इस मायने में भी प्रशांत किशोर के लिए खास है कि पिछले साल ही हुए विधानसभा चुनाव में इस सीट पर प्रशांत किशोर की उम्मीदवार वंदना कुमारी को महज 7,717 वोट मिले थे, जो कुल वोटिंग का महज पांच प्रतिशत था.

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चुनावी इतिहास को देखें तो प्रशांत की जीत साल 1967, साल 1985 और 1990 के चुनावों का दोहराव भी है. साल 1967 में मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय को इस सीट से एक गुमनाम पार्टी जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा ने हरा दिया था. इसी तरह 1985 और फिर 1990 के चुनाव में एक निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने इस सीट से परम्परागत पार्टियों को धूल चटाकर जीत दर्ज की थी.

लगभग 3.79 लाख वोटरों वाली इस सीट पर विगत 30 जुलाई को वोटिंग हुई थी, जिसमें 34 प्रतिशत वोट पड़े थे, जो पिछले दो तीन दशकों में सबसे कम वोटिंग प्रतिशत था.

वोटिंग के दिन बांकीपुर के आधा दर्जन से अधिक बूथों पर बीजेपी और जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई थी, उससे ये अंदाजा तो हो ही रहा था कि मुख्य मुकाबला प्रशांत किशोर और बीजेपी के बीच ही है और हुआ भी ऐसा ही.

3 अगस्त की सुबह मतगणना शुरू हुई, तो पहले राउंड से ही प्रशांत किशोर ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार पर बढ़त बनाना शुरू कर दिया था जो आखिर तक बरकरार रही.

सम्राट फैक्टर

मगर सवाल ये है कि पिछले साल अक्टूबर-नवम्बर में अपनी पार्टी के 90 प्रतिशत से अधिक उम्मीदवारों की जमानत खो देने वाली जन सुराज पार्टी ने ऐसा क्या कर दिया कि उसके जनाधार में उछाल आ गया?

इस सवाल का जवाब प्रशांत किशोर के चुनाव प्रचार अभियान में ही मिलता है.

दरअसल, इस सीट पर चुनाव लड़ने की तैयारी प्रशांत किशोर तभी से कर रहे थे जब नितिन नवीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे और उनका राज्यसभा जाना तय माना जा रहा था. पार्टी ने जीत सुनिश्चित करने के लिए माइक्रो लेवल पर चुनाव प्रबंधन की रणनीति अपनाई और दो सौ से अधिक कार्यकर्ताओं को अभियान में झोंक दिया. 

वहीं, बीजेपी की शुरुआत ही कमजोर हुई. पार्टी ने पहले अभिषेक बंटी को उम्मीदवार बनाया. उन्होंने नामांकन भी दाखिल कर दिया, लेकिन बाद में बीजेपी ने उनसे टिकट ले लिया और नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया. बताया जाता है कि अभिषेक के पिता और मां के नाम बहुचर्चित चारा घोटाले में थे, इसलिए बीजेपी ने उनसे टिकट ले लिया था. इस घटना ने बीजेपी को बैकफुट ला दिया, क्योंकि पार्टी के पास अपने बचाव में कहने के लिए कुछ नहीं था. 

दूसरी तरफ, प्रशांत किशोर ने इसे यह कहकर प्रचारित किया कि बीजेपी को उनसे टक्कर लेने के लिए कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा है और यह भी कि बीजेपी नेता ये कहते हैं कि पार्टी अगर कुत्ते बिल्लियों को भी टिकट देगी तो वो जीत जाएगा. हालांकि बीजेपी ने इसका खंडन करते हुए कहा कि बीजेपी के किसी नेता ने ऐसा नहीं कहा था.

इसके अलावा सम्राट फैक्टर को भी एक बड़े कारण के तौर पर देखा जा रहा है. प्रशांत किशोर पूरे चुनाव अभियान के दौरान सीएम सम्राट चौधरी पर हमलावर रहे. उन्होंने बार बार ये कहा कि अगर बांकीपुर चुनाव में बीजेपी हार जाती है, तो यह एक तरह से सम्राट चौधरी के खिलाफ जनमत होगा और बीजेपी मुख्यमंत्री बदल देगी. प्रशांत किशोर की रणनीति भरत तिवारी कथित एनकाउंटर के चलते बीजेपी से नाराज ऊंची जातियों को अपने पाले में करना था. ऐसा लगता है कि इस रणनीति ने जमीन पर काम किया है.

पटना नगर निगम क्षेत्र के एक वार्ड का जिम्मा संभालने वाले राष्ट्रीय जनता दल के एक पूर्व विधायक ने कहा,

हम लोग जब वार्ड में काम कर रहे थे, तभी महसूस किया कि प्रशांत की दावेदारी मजबूत है. सवर्ण के एक हिस्से ने प्रशांत किशोर के पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर दिया था.

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. पुष्पेंद्र कहते हैं कि जिस तरह से प्रशांत किशोर सवर्णों को लुभाने के लिए भरत तिवारी एनकाउंटर के बहाने बांकीपुर चुनाव में बीजेपी की हार को सम्राट चौधरी के खिलाफ जनमत बता रहे थे, उससे सवर्णों का एक धड़ा प्रशांत किशोर के पाले में आ गया था. उन्होंने कहा,

इससे प्रशांत किशोर की जीत तो तय ही थी. मुझे आश्चर्य तब होता, जब प्रशांत किशोर नहीं जीतते.

आरजेडी के वोट बैंक में भी टूट

दूसरी तरफ, मुस्लिम-यादवों के एक बड़े हिस्से ने भी प्रशांत किशोर को वोट दिया है. मुस्लिमों में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं और इस वजह से वे राष्ट्रीय जनता दल से इतर राजनीतिक विकल्प टटोल रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ, एनकाउंटर में यादवों की हत्याओं व हरे गमछे पर तंज कसने के चलते यादवों में भी सम्राट चौधरी को लेकर नाराजगी थी.

राष्ट्रीय जनता दल का प्रचार अभियान देखने वाले एक अन्य नेता ने कहा,

यह सीट राष्ट्रीय जनता दल का स्ट्रॉन्गहोल्ड नहीं है. यहां पार्टी का मजबूत संगठन भी नहीं है. इसलिए इस पार्टी से यादवों को उम्मीदें नहीं थीं और उन्होंने भी प्रशांत किशोर की तरफ रुख किया.

चूंकि सवर्ण और यादव प्रशांत किशोर के साथ आ गए, तो पिछड़ी व दलित आबादी ने भी प्रशांत किशोर का रुख किया और इस तरह पीके ने अपनी जीत की स्क्रिप्ट लिख दी.

एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन ने कहा,

दरअसल, सवर्णों और यादवों में बीजेपी और खास तौर से सम्राट चौधरी के खिलाफ व्याप्त भीषण नाराजगी को राष्ट्रीय जनता दल अपने पक्ष में नहीं भुना सका. इसे प्रशांत किशोर ने भुनाया.

इसके अलावा, इंडिया गठबंधन की साझेदार पार्टियों ने भी इस उपचुनाव में कुछ खास मेहनत नहीं की. कांग्रेस के एक धड़े ने गुपचुप तरीके से प्रशांत किशोर का समर्थन किया, जबकि भाकपा (माले) Gen-Z आंदोलन में मुब्तिला रहा.

जीत का प्रमाण पत्र लेने के बाद प्रशांत किशोर ने कहा कि यह जीत बांकीपुर की जनता के भरोसे की जीत है. जनता ने बदलाव की राजनीति पर विश्वास जताया है और अब उनकी जिम्मेदारी और बढ़ गई है. उन्होंने कहा कि वह बांकीपुर की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करेंगे.

वहीं, सम्राट चौधरी ने कहा,

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जनता ने जन सुराज को चुना है. मैं जनता के इस निर्णय का सम्मान करते हुए प्रशांत किशोर को उनकी जीत पर हार्दिक बधाई देता हूं.

इन सबके बीच, आख़िरी सवाल यह है कि इस जनमत को राज्य स्तर पर कैसे देखा जाए और दूसरी पार्टियों के लिए इसमें क्या संदेश है?

महेंद्र सुमन कहते हैं,

इस परिणाम का कोई दूरगामी राजनीतिक प्रभाव नहीं निकलने वाला है, अलबत्ता यह राजद और बीजेपी के लिए एक 'वेक-अप कॉल' जरूर है.

आरजेडी के पूर्व विधायक भारत मंडल ने कहा, "इससे राजनीतिक दलों को एक सबक मिलेगा. हम सीधा मानते हैं कि राजद को अब आंदोलन के केंद्र में आने की जरूरत है. गरीब, दलित और पिछड़ों के अधिकारों व आरक्षण की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर उतरना होगा."

(इस लेख के लेखक उमेश कुमार राय एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो बिहार में समाचार और राजनीति कवर करते हैं.)

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